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परम पूज्य गच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय धर्मधुरंधर सूरीश्वर जी म.सा. की पावन निश्रा में सम्पन्न हुए शासन प्रभावना के शुभ कार्य
गुरु इन्द्र, गुरु रत्नाकर सूरीश्वर जी म.सा. की जन्मभूमि सालपुरा गांव में मकर संक्रान्ति का भव्य आयोजन 
BY navyugnirmata / February 14, 2018
दर्पणवत् जीवन में शरीर का मंदिर भी प्रकाशमान हो उठता है क्योंकि उस मंदिर में आत्मा की चिदानंद ज्योति प्रखर बन जाती है। तब यह तन एक पवित्र मंदिर का रूप ले लेता है। शरीर को पवित्र मंदिर तथा आत्मा को चिदानंद ज्योति स्वरूप मानकर जीने वाला मानव अपने जीवन में भक्ति और शक्ति को जागृत कर लेता है तथा अपने जीवन को दर्पणवत् बना देता है। भक्ति का भाव जब प्रगाढ़ बनता है तब शक्ति पुंज का जागरण होता है। भक्ति व शक्ति की शुभता से जिसके जीवन की पारदर्शिता जगमगा उठती है।
आज माघ बदि प्रथम 13, दिनांक 14.1.2018; रविवार को गुरु इन्द्र व गुरु रत्नाकर सूरीश्वर जी म.सा. की जन्मभूमि सालपुरा गांव में मकर संक्रान्ति भव्यातिभव्य रूप से मनाई गई। 
परम पूज्य गच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय धर्मधुरंधर सूरीश्वर जी म.सा., परम पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय विद्युतरत्न सूरीश्वर जी म.सा., उपाध्याय श्री अनंतचन्द्र विजय जी म.सा., प्रवर्तक श्री विनोद विजय जी म.सा. आदि ठाणा, साध्वी सुसेना श्री जी म.सा., साध्वी सुमेधा श्री जी म.सा. आदि ठाणा तथा चतुर्विध संघ के साथ बैंड बाजों के संग गुरु इन्द्र व गुरु रत्नाकर सूरीश्वर जी म.सा. के जन्म स्थल मकान में पधारे। वहां पर गुरु इन्द्र व गुरु रत्नाकर सूरि जी के सांसारिक परिवारजनों ने गहुंली करके गुरुदेवों को दोनों गुरुओं की जन्म स्थल मकान के दर्शन करवाये। साथ ही उन्होंने पूज्य गच्छाधिपति भगवंत को दोनों मकानों के साथ भूमि के कागज पत्र सहर्ष सुपुर्द किये और कहा कि आप श्री जी को जो कुछ बनाना हो आप यहां बनाये, ताकि गुरुजनों की कीर्ति चऊँ ओर फैलती रहे। पूज्य श्री जी ने भूमि के कागज पत्र स्वीकारे और चतुर्विध संघ के समक्ष कहा कि दोनों भूखण्ड पर गुरु इन्द्र व गुरु रत्नाकर सूरि जी म.सा. का गुरु मंदिर बनेगा। गुरु मुख से उद्घोषणा सुनकर गांव के लोग व चतुर्विध संघ गुरुओं के जय-जयकार करने लगे। तुरंत ही खात् मुहूर्त, शिलान्यास व गुरु मंदिर बनाने के लाभार्थी तैयार हो गये। संघ के श्रावकों ने कहा गुरुओं के लिये सर्वस्व न्यौछावर है।
पूज्य श्री जी आदि चतुर्विध संघ के साथ प्रवचन मण्डप में पधारे। पूज्य श्री जी के मंगलाचरण के साथ संक्रान्ति प्रवचन प्रारम्भ हुआ। श्री राकेश जी जैन (दिल्ली) ने गुरु भक्ति का भजन गया। श्री महेश जी जैन सालपुरा वालों ने सभी महानुभावों का स्वागत व आभार व्यक्ति किया। जैन पाठशाला सालपुरा व जाखरपुरा के बच्चों ने स्वागत गीत गाया।
साध्वी सुमति श्री जी म.सा. ने अपने प्रवचन में फरमाया - पूज्य गुरुदेव श्रीमद् विजय इन्द्रदिन्न सूरीश्वर जी म.सा. व गुरुदेव श्रीमद् विजय रत्नाकर सूरीश्वर जी म.सा. के जीवन पर सूक्ष्म दृष्टिपात करेंगे तो विदित होगा कि प्रत्येक क्षेत्र में जहां उन्होंने सादा जीवन उच्च विचार का आदर्श प्रस्तुत किया और वहां स्वयं को पूर्ण रूप से स्वावलम्बी भी सिद्ध किया। उनका जीवन दर्शन सादगी व स्वावलम्बन के दोनों सद्गुणों से पूर्णतः प्रभावित रहा है। गुरुदेव का यही संदेश कि जो कोई भी महानुभाव बाह्य व आभ्यंतर यानि चहुमुखी विकास चाहते हैं उन्हें जिनशासन की आज्ञानुसार आचार-विचार में अपने जीवन को रचा बसा लेना चाहिये तथा सबको अपनी जैनत्व संस्कृति व जैनत्व सभ्यता के अनुरूप ही अपनी जीवन प्रणाली का निर्माण करना चाहिये।
कोकिल कंठी मुनि श्री अरिहंतचन्द्र विजय जी म.सा. ने बहुत ही सुन्दर गुरु भक्ति का भजन गाया।
पूज्य श्री जी ने अपने प्रवचन में फरमाया - आज की मकर संक्रान्ति पूज्य गुरुवर्यों की जन्मभूमि पर होना हमारा परम सौभाग्य है। उनके अणु-परमाणु हमारे जीवन में भी आयंे, जिससे हमारा जीवन भी पावन पवित्र बन जाये। पूज्य गुरुवर्यों का जीवन कैसा था - मार्गदर्शन की दृष्टि में प्रेरक, साधक की दृष्टि में जीवन मोचक तथा वैराग्य, परमार्थ, प्रगति, ज्ञान तथा व्यक्ति व समष्टि के समन्वय पर जोर देने वाले महापुरुष, ऐसे उनके दिव्य जीवन दर्शन की झलक, विचारों की प्रगलभता, दृष्टा की प्रतिभा, आत्मरूप की तन्मयता, दीन-हीनों के प्रति वत्सलता, एक ही शब्द में कहना हो तो आध्यात्मिक मानवता की प्रतीति सम्यग् रूप से हर पृष्ठ में दिग्दर्शित होती है।
गुरु इन्द्र व गुरु रत्नाकर सूरि जी म.सा. कहते रहते थे - जीवन के निर्माण में परिस्थितियां हकीकत में बाधक नहीं बनतीं, बाधक तो मनःस्थिति होती है। मन की तैयारी न हो तो सारी तैयारियां व्यर्थ हो जाती हैं। पौरुषधारी पुरुष वे ही कहलाते हैं जो अपने दृढ़ मनोयोग से कठिनतम परिस्थितियां को भी अनुकूल बना लेते हैं। गुरुदेव भी यही प्रेरणा देते थे कि हमें भी परिस्थितियांें के प्रवाह में नहीं बहना है, हमें आत्मगुणों का पारखी बनना है तब ही जीवन धन्य बनेगा। आज इस क्षेत्र में जो कुछ भी कार्य हो रहा है-गुरु इन्द्र की महती कृपा से हो रहा है-‘करते हो तुम गुरुदेव मेरा नाम हो रहा है।’ इस क्षेत्र में संपूर्ण गुरु की कृपा से ही सम्पन्न होगा।
गुरु इन्द्र ने अपनी इस पैतृक भूमि पर जहां-जहां गांव-गांव में भी विचरण किया, ऐसे इन्द्रप्रदेश के सभी संघों का आभार व्यक्त किया।
- इस संक्रान्ति के अवसर पर श्री आत्मानंद जैन महासभा, उत्तरी भारत के अध्यक्ष श्री सुशील जी जैन, चंडीगढ़ तथा श्री नरेन्द्र जी जैन दिल्ली वालों ने अपने विचार रखे।
- गुरु रत्नाकर सूरि जी म.सा. की जन्मभूमि के भूखण्ड को पूज्य श्री के करकमलों में अर्पण करने वाले उनके सांसारिक परिवारजनों का श्रीसंघ की ओर से बहुमान किया गया।
- इस प्रसंग पर विक्रम जी जैन लुधियाना, श्री दीपक जैन जालंधर, श्री मोहन जी जैन मुंबई, श्री सुरेश जी जैन भाण्डुप, श्री गौतम जी जैन बारिया ने प्रसंगोपरान्त भजन सुनाकर सभा को समा में बांधकर झुमाया।
- इन्द्रप्रदेश के परीक्षार्थी विद्यार्थियों का श्री जैन विद्या शोध संस्थान ओस्त्रा तीर्थ की ओर से रजत पदक से सम्मानित किया गया।
- श्री नाथु-वीरा जी जैन जापा गांव निवासी को इन्द्रप्रदेश के आदर्श गुरुभक्त से नवाज़ा गया।
- संक्रान्ति के लाभार्थी श्री रत्नयोगी ग्रुप ठाणे (मुंबई) के भाग्यवानों का बहुमान किया गया।
- मंच का संचालन श्री आनन्द जी जैन (खोड़ियारपुरा) ने किया।
श्री विजय जी कोचर ने (बीकानेर) ने संक्रान्ति भजन सुनाया।
पूज्य श्री जी ने संक्रान्ति स्तोत्र व संक्रान्ति का श्रवण करवाया।
पूज्य श्री जी आदि ठाणा का लफणी गांव में पर्दापण
श्रावक बनता है पात्रता से, योग्यता से तथा आत्मशुद्धि के पुरुषार्थ में आगे बढ़ने से। जैसे जिस थाली में सुबह भोजन किया गया, क्या मांजे बिना उस थाली में शाम को भी भोजन करते हैं ? अवश्य ही नहीं करते होंगे। क्यों ? अशुद्ध थाली में कैसे भोजन करें ? क्या अपने मन को हर वक्त मांजते रहते हैं ? द्वेष हुआ या मन मैला हुआ, तो क्या उस गंदे मन को तुरंत मांज लेते हैं ? यदि शुद्धि का ऐसा विचार नहीं रखा जाता है तो पात्रता कहां रहेगी ? वहां योग्यता भी क्या टिकी रहेगी ?
आज माघ बदि द्वितीया 13, दिनांक 15.1.2018; सोमवार को पूज्य श्री जी, पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय विद्युतरत्न सूरीश्वर जी म.सा., प्रवर्तक मुनिराज श्री विनोद विजय जी म.सा. आदि ठाणा, साध्वी सुसेना श्री जी म.सा. आदि ठाणा, परम पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय रत्नाकर सूरीश्वर जी म.सा.के पैतृक गांव (कर्म भूमि) लफणी चतुर्विध संघ के साथ पधारे।
पूज्य श्री जी ने श्री शंखेश्वर पाश्र्वनाथ जिनालय का अधूरे निर्माण कार्य को सम्पूर्ण करवाया। जिनालय का शुद्धिकरण करवाकर हवन का विधान भी करवाया। लफणी संघ के भाग्यवानों में हर्षोल्लास का वातावरण भी सृजन हुआ।
परम पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय जगच्चन्द्र सूरीश्वर जी म.सा. के 62वें जन्मदिवस व विजय वल्लभ इंग्लिश मीडियम स्कूल का वार्षिक उत्सव के उपलक्ष्य में गुणानुवाद सभा पूज्य श्री जी आदि का पावागढ़ तीर्थ में पदार्पण
संस्कार सम्पदा स्वर्ण रत्न सम्पदा जैसी साधारण सम्पदा नहीं होती-यह तो अनमोल सम्पदा है जो जीवन का निर्माण करती है, मानवता का संचार करती है तथा आत्म-विकास के चरम उद्देश्य तक पहुंचाना चाहती है। स्वर्ण रत्न सम्पदा के व्यामोह में पड़कर जो विमार्गी हो जाते हैं संस्कार सम्पदा उसे समभाव में समेटकर चारित्रशील बना देती है कि वह स्वयं के व सबके हित साधता हुआ अपूर्व सुख का रसास्वादन करता रहे।
आज माघ बदि 14, दिनांक 16.01.2018; मंगलवार को प्रातः 8ः30 बजे पूज्य श्री जी पूज्य आचार्य श्रीमद् विजय विद्युतरत्न सूरीश्वर जी म.सा.; प्रवर्तक श्री विनोद विजय जी म.सा. आदि ठाणा साध्वी श्री सुसेना श्री जी म.सा., साध्वी सुमेधा श्री जी म.सा. आदि ठाणा चतुर्विध संघ व बैंड-बाजों के मधुर-ध्वनि के साथ पावागढ़ तीर्थ में पदार्पण हुआ। श्री चिंतामणि पाश्र्वनाथ परमात्मा के दर्शन करके उपाश्रय के प्रवचन मण्डप में परम पूजय आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय जगच्चंद्र सूरीश्वर जी म.सा. के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में पधारे और गुणानुवाद सभा का आयोजन हुआ।
पूज्य श्री जी के मंगलाचरण के साथ ही गुणानुवाद सभा प्रारम्भ हुई। श्री विजय वल्लभ इंग्लिश मीडियम स्कूल पावागढ़ के बच्चों ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया।
पूज्य श्री जगच्चंद्र सूरीश्वर जी म.सा. की छवि को माल्यार्पण करके, वासक्षेप पूजा करके, छवि के दीपक प्रज्जवलित किया गया।
श्री विजय वल्लभ इंग्लिश मीडियम स्कूल, पावागढ़, धनेश्वर और जीवनपुरा का वार्षिकोत्सव होने के कारण छात्र-छात्राओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करके हजारों की संख्या में बैठे हुए महानुभावों के मन को हर लिया।
पूज्य श्री जी ने गुणानुवाद करते हुए फरमाया - यह पावागढ़ तीर्थ पूज्य गुरुदेव श्रीमद् विजय इन्द्रदिन्न सूरीश्वर जी म.सा. द्वारा विस्थापित और उस मूल को सींचने का कार्य पूज्य कार्यदक्ष आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय जगच्चंद्र सूरीश्वर जी म.सा. ने किया। उनकी जितनी अनुमोदना करें उतनी कम है।
पूज्य श्री जी अपने मित्र कार्यदक्ष आचार्य श्रीमद् विजय जगच्चंद्र सूरीश्वर जी म.सा. के जन्मदिवस पर विशेष रूप से याद किया और उनकी कमी को भी महसूस किया। उनके शरीर में इतनी पीड़ाकारी रोग होने पर भी उनके चेहरे पर न कभी शिकन आई न उनकी जुबान से कभी कोई शिकायत निकली। तन में व्याधि और मन समाधि के ऐसे प्रसंग बड़े प्रेरणास्पद होते हैं। ऐसे महापुरुष वंदनीय, पूजनीय व स्मरणीय बन जाते हैं। स्मरण वह सुगंध है जो पुष्प के सम्पूर्ण विकास के पश्चात् प्रकट होती है और फैलती है।
मेरे मित्रवर्य द्वारा स्थापित स्कूल रूपी लगाए गए इस पौधे को वटवृक्ष का रूप देखकर हृदय के अन्तर भावों से खुशी व्यक्त की। यह वटवृक्ष और भी आगे फूले फले तभी उनको सच्ची स्मरणांजली होगी।
स्कूलों के कई विद्यार्थियों ने इंग्लिश में अपना वक्तव्य देकर आचार्य भगवंत को याद किया।
गुणानुवाद सभा के पश्चात् साधर्मिक वात्सल्य भी सम्पन्न हुआ।
इन्द्र प्रदेश के संगवा गांव में जिनमंदिर के 18 अभिषेक व देव-देवी प्रतिमा की प्रतिष्ठा
वास्तव में भाव शुद्धि की साधना है-धर्माचरण। भाव शुद्धि के बाद ही व्यवहार शुद्धि होती है। साधना का तात्पर्य परमात्मा को जान लेना ही नहीं, परमात्मा को पा लेना है। ऐसी साधना में ही स्वाध्याय सत्संग आदि की सार्थकता है, जिससे सम्पूर्ण व्यवहार भाव शुद्धि के आधार पर चले, इसलिये वह धर्म और उसके व्यवहार में दृढ़ रहे तथा धर्म के प्रति अविचल श्रद्धा बनाये रखें। वह भय, भ्रम व भ्रान्ति से दूर रहे।
आज माघ सुदि 1, दिनांक 18.1.2018; गुरुवार को पूज्य श्री जी, पूज्य आचार्य श्रीमद् विजय विद्युतरत्न सूरीश्वर जी म.सा., प्रवर्तक मनिराज श्री विनोद विजय जी म.सा. आदि साधु-साध्वीवृंद के संग बैंड-बाजों की सुरीली ध्वनि के साथ सागवा गांव में प्रवेश हुआ। जिनमंदिर के दर्शन करके उपाश्रय भवन में पधारें। पूज्य श्री जी ने मंगलाचरण के साथ हृदयस्पर्शी प्रवचन में फरमाया - आत्मिक आनन्द और सौन्दर्य सदाचार से ही प्राप्त किया जा सकता है। कोई भी महानुभाव हो अपने-अपने स्तर पर सदाचार का आचरण करे तो उसे आत्म शोध का सही ज्ञान हो सकता है और शोधन प्रक्रिया से आन्तरिक शुद्धिकरण किया जा सकता है। सदाचार सम्पन्नता ही वस्तुतः उस भीतर के झरने को खोल पाती है तथा उस आन्तरिक सौन्दर्य की जड़ी ढूंढ लेती है जो मनुष्य के जीवन को कृत्य-कृत्य कर देती है।
आज विजय मुहूर्त में 12.39 बजे जिनमंदिर में 18 अभिषेक सम्पन्न हुए।
श्री माणिभद्र वीर, श्री पाश्र्वयक्ष, श्री पद्मावती देवी की प्रतिष्ठा
अपने वर्तमान को सजग होकर देखने परखने तथा बदलने-सुधारने से व्यक्ति के सही चारित्र का निर्माण होता है तथा उसकी बुद्धि आध्यात्मिक दृष्टि से जागृत होती है। अपने प्रत्येक क्षण के प्रति जागरूक रहने से वह प्रतिक्रिया से बचता है और राग-द्वेष के भावों से लिप्त नहीं होता है, तब उसका विचार, वचन और व्यवहार सम्यक् होता चला जाता है।
आज माघ शुदि 2, दिनांक 19.1.2018, शुक्रवार को पूज्य श्री जी आदि ठाणा की शुभ निश्रा में जिनमंदिर के प्रागंण में श्री माणिभद्र वीर, श्री पाश्र्वयक्ष, श्री पद्मावती आदि देव-देवी बिम्बों की ¬ पुण्याहं....पुण्याहं के मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई।
प्रतिष्ठा के पश्चात् पूज्य श्री जी ने देव-देवी के महत्त्व पर हृदयस्पर्शी प्रवचन दिया।
इन्द्रप्रदेश के मोतीपुरा ग्राम में पूज्य श्री जी का आगमन
जैसे विचार होंगे, वैसे ही शब्दों का मुख द्वारा उपयोग होगा। यह सत्य है कि मधुर वाणी में शक्ति और शांति दोनों का निवास होता है। इसी से पारस्परिक सम्बन्धों में सुदृढ़ता व पवित्रता का संचार होता है। वचनों से दरिद्र व्यक्ति स्वयं तो किसी को मीठे वचन दे नहीं पाता परन्तु कोई मीठे वचनों का प्रयोग करके सबको हर्षित करता हो, उसे भी वह बर्दाश्त नहीं करता है। इसके आज माघु शुदि 2, दिनांक 19.01.2018; शुक्रवार को सायं मोतीपुरा पूज्य श्री जी पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय विद्युतरत्न सूरीश्वर जी म.सा., प्रवर्तक मुनिराज श्री विनोद विजय जी म.सा. आदि साधु-साध्वीवृंद के संग बैंड-बाजों के साथ गांव में प्रवेश हुआ। यह मोतीपुरा गांव हमारे समुदाय के वयोवृद्ध तपस्वी मुनिराज श्री विनय रत्न विजय जी म.सा. की जन्म भूमि है।
पूज्य श्री जी ने प्रवचन में फरमाया- जिनकी कत्र्तव्य चेतना जागृत हो जाती है, वे सौम्य बन जाते हैं, सुख-शान्ति पा जाते हैं ? कत्र्तव्य पालन की परिधि में सारे सद्गुण आ जाते हैं। अतः कत्र्तव्य के प्रति निष्ठा होनी चाहिये तथा कत्र्तव्य का पालन निष्ठा के साथ होना चाहिये, उसे कत्र्तव्य को ही धर्म का समग्र स्वरूप माना जा सकता है क्योंकि धर्म वही है, जो कत्र्तव्य है। कत्र्तव्य साधन है, धर्म सौम्य है और साधना मानव को करनी है कि उसका जीवन सफल हो जाए।
पूज्य श्री जी ने इन्द्र प्रदेश के मोतीपुरा गांव में श्री जैन संघ मोतीपुरा की विधिवत् स्थापना की।
पूज्य श्री जी का इन्द्रप्रदेश के तलावड़ी गांव में पर्दापण
यह मानव जीवन ऋतुओं के समान परिवर्तनशील है। इस परिवर्तन के रहस्य को जो आत्मसात् कर लेता है, वह जीवन के यर्थाथ को जान जाता है तथा स्वतः ही गुणग्राही हो जाता है, उसे यह कहने या निर्देश देने की आवश्यकता नहीं रहती कि तुम सरल, मृदुल, सहज और सौम्य बनो। वह यह भी समझ लेता है कि समय तेजी से जा रहा है और गया हुआ समय कभी लौटता नहीं, इसलिये समय को सार्थक बना लिया जाए।
आज माघ शुदि 3, दिनांक 20.1.2018; शनिवार को प्रातः 8ः30 बजे पूज्य श्री जी, पूज्य आचार्य श्रीमद् विजय विद्युतरत्न सूरीश्वर जी म.सा., प्रवर्तक मुनिराज श्री विनोद विजय जी म.सा. आदि साधु-साध्वीवृंद चतुर्विध संघ के साथ बैंड-बाजों की मधुर लहरी के संग गांव में प्रवेश किया। जिनालय के दर्शन करके उपाश्रय में पधारें।
पूज्य श्री जी ने प्रवचन में फरमाया - जो अपनी आत्मा को अप्रिय लगता हो, उसका आचरण दूसरों के साथ कदापि न करें। दूसरों के साथ अप्रिय व्यवहार करना विभाव है और प्रिय व्यवहार करना स्वभाव है। अतः स्वभाव की ओर चलें, विभाव को छोड़ें। प्रिय और अप्रिय की कसौटी आत्मा की ही मानी गई है। वस्तुतः प्रत्येक मानव के लिये मूल में उसकी आत्मा ही निर्णायक है। वह निर्णयक्षम बने, इसके लिये सम्यग् ज्ञान के पट खोलने होंगे और सदाचरण के चरण कत्र्तव्य के मार्ग पर गतिशील बनाने होंगे।
पूज्य श्री जी ने श्री आदिनाथ जैन संघ की स्थापना की। परमार क्षत्रिय जैन महासंघ के उपाध्यक्ष और तलावड़ी के अश्विन भाई बारिया जैन, प्रेमचंद भाई आदि ने पूज्य गुरुदेवों को कांबली बोहराई और जिनमंदिर में श्री पाश्र्वनाथ पंचकल्याणक पूजा भी सम्पन्न हुई तथा संघ स्वामी वात्सल्य भी हुआ।
पूज्य श्री जी आदि का भगवानपुरा गांव में पर्दापण
आज मनुष्य के जीवन में इतना दुःख क्यों है ? इतनी पीड़ा क्यों है ? इतना तनाव क्यों है ? यह सब देखकर लगता है कि मनुष्य से अधिक पशु-पक्षी सुखी है और समुद्र व धरती में भी अधिक सुखपूर्ण प्रसन्नता है क्योंकि ऊसर से ऊसर भूमि पर भी फूल खिलते हैं और समुद्र जल में भी खुशियों की लहरें उठती हैं परन्तु आज देखें तो मनुष्य के जीवन में सामान्यतया न खुशी के फूल खिलते हैं और न आनन्द की लहरें उठती हैं। कितना क्षुद्र रूप हो रहा है इस जीवन का ?
आज माघ शुदि 4, दिनांक 21.1.2018; रविवार को पूज्य श्री जी, पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय विद्युत रत्न सूरीश्वर जी म.सा., प्रवर्तक मुनिराज श्री विनोद विजय जी म.सा. आदि ठाणा, साध्वी श्री सुमिता श्री जी म.सा. आदि ठाणा का चतुर्विध संघ व बैंड-बाजों के साथ गांव में प्रवेश हुआ। 
जिनमंदिर के दर्शन करके उपाश्रय में पधारें। भगवानपुरा से दीक्षित साध्वी श्री सुपूर्णा श्री जी म.सा. ने प्रवचन में फरमाया - हमें अन्तर हृदय से इतनी खुशी हो रही है कि पूज्य गच्छाधिपति गुरुदेव बड़े-बड़े शहरों का मोह छोड़कर छोटे-छोटे गांवों में विचर कर धर्म की प्रभावना करके लोगों के जीवन में जागृति की ज्योति जलाई हैं वह बहुत ही अनुमोदनीय है।
रमेश बलवंत भाई जैन ने अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा - गुरुदेव श्रीमद् विजय इन्द्रदिन्न सूरीश्वर जी म.सा. के उपकारों को स्मरण किया - आज उन्हीं की पाट-परम्परा पर पूज्य गुरुदेव ने इस क्षेत्र इन्द्र प्रदेश के नाम से अलंकृत किया, इसके लिये अपार खुशी है। वर्तमान में आप इस इन्द्रप्रदेश में विचरण करके परमार क्षत्रिय जैन संघ संगठन को जो मज़बूती प्रदान की है, उसके लिये हम आप श्री के सदैव ऋणी रहेंगे। भगवानपुरा इन्द्रप्रदेश का अन्तिम गांव है।
पूज्य श्री जी ने प्रवचन में फरमाया - प्रत्येक मनुष्य के यह वश और अधिकार की बात है कि वह अधिकतम रूप से प्रसन्न रहते हुए दूसरों के बीच प्रसन्नता बिखेरता व बांटता रहे तथा स्वभाव के वैभव का अर्जन करता रहे। अपनी प्रसन्नता का दायरा फैलाते रहकर सबकी खुशी हासिल करें। दृष्टिकोण को बदले बिना प्रसन्नता को पाया नहीं जा सकता है। धर्माराधना के माध्यम से दृष्टि को बदल डालें तो आपके भीतर की सृष्टि भी बदल जायेगी-वैभवशाली हो जायेगी।
पूज्य श्री जी ने इन्द्रप्रदेश में श्री सुविधिनाथ जैन संघ भगवानपुरा की विधिवत् स्थापना की। संघ के महानुभावों ने पूज्य गुरुदेवों को कांबली बोहराई। श्रीसंघ का स्वामीवात्सल्य भी हुआ। सायंकाल जिनालय में महाआरती भी हुई।