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   ‘‘धर्म उच्चतम है वैसे ही यदि साधक उत्तम बन जावे तो मोक्ष पा सकता है, हमें अपने अन्दर झांकना होगा। धर्म रटने से धर्म नहीं मिलता। मुक्ति पुकारने से मुक्ति नहीं मिलती। उसके लिए पुरुषार्थ करना पड़ेगा। जहां तक बहिर्मुखी रहोगे, वहां तक धर्म आत्मा का स्पर्श नहीं कर पायेगा, धर्म पारसमणि है। साधक इसके सम्पर्क में आता है तो वह भी शुद्ध सोना रूप बन जाता है।’’ (धर्म और धर्मी से साभार)
 - आचार्य विजय रत्नाकर सूरि

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